ओम जी को जाना था सो वो चले गये बावजूद हम सब की दुआओं और शुभकामनाओं के । कवि श्री संदीप शर्मा ने जैसा मुझे बताया था उस हिसाब से मन में कहीं न कहीं ये डर हमेशा ही लगा रहा पिछले एक माह में कि ओम जी हंसाते हंसाते रुला न जायें । और हुआ भी वही । बहुत सारी यादें हैं, बहुत सारी स्मृतियां हैं । यादें जो अच्छी होती हैं तो भी रुलाती हैं और बुरी होती हैं तो भी । कहीं किसी ब्लाग पर कमेंट में मैंने लिखा कि हम अब हंसने के अधिकारी ही नहीं रहें हैं । हम अपने जीवन में इतना कुछ गलत कर रहे हैं कि अब हंसने जैसी निष्छल चीज पर हमारा कोई अधिकार ही नहीं रहा है । और इसीलिये जब ओम जी जैसा कोई आकर हमें हंसाता है तो उस ऊपर वाले को ऐसा लगता है कि ये तो उसके अधिकार क्षेत्र में दखल कर रहा है और बस । ओम जी ने मंचों पर कभी भी फूहड़ता और द्विअर्थी संवादों को सहारा नहीं लिया । उनकी कलावती लीलावती की कहानी में इतना सौम्य हास्य है कि उसके आगे लाफ्टर जैसे हजारों कार्यक्रम भी बौने दिखाई देते हैं । उनके जाने के बाद कई बार उनकी कलावती लीलावती का वीडियो देखता रहा । उनकी कलावती लीलावती को आज मंच के कई सारे कवि अपने नाम से पढ़ रहें हैं लेकिन दादा का अपना अलग ही अंदाज था कलावती लीलावती पढ़ने का । सीहोर के मंच पर एक बार एक कवि ने एक अत्यंत अशालीन चुटकुला पढ़ दिया जिस पर उसको काफी तालियां भी मिलीं । मंच पर दादा माणिक वर्मा, सांड नरसिंहपुरी, पवन जैन, अशोक भाटी जैसे कवि बैठे थे । ओम जी ने मुझे पास बुलाया और कहा बिठा दूं इसको । मैंने कहा दादा आप संचालक है जो उचित लगे सो करो । ओम जी ने माइक पर ऐसी झाड़ लगाई उस कवि को और कहा ये श्रोता वही खाते हैं जो हम परोसते हैं, आपके पास कविता हो तो पढ़ो नहीं तो बैठ जाओ । और वो कवि बैठ गये । जनता ने तालियां बजा कर ओम जी के निर्णय पर मुहर लगा दी । ऐसे थे ओम जी । मेरी श्रद्धांजलि और इस बार का पूरा तरही मुशायरा ओम जी की स्मृतियों को समर्पित ।
स्मृति शेष :- सीहोर का वो कवि सम्मेलन जिसका संचालन दादा ओम व्यास ने किया था
तरही मुशायरा इस बार का तरही मुशायरा कुछ लम्बा चलना है और ये भी कि इस बार काफी अच्छी ग़ज़लें मिली हैं और इन ग़ज़लों में बहुत कुछ ऐसा है जो मन को छू लेने वाला है ।
बहर : इस बार हमने जो बहर ली थी वो बहुत ही आसान सी बहर थी । आसान लेकिन बहुत ही लोकप्रिय बहर है ये । कई अच्छी ग़ज़लें इस बहर पर लिखी गई हैं । मुनव्वर राना साहब की मशहूर ग़ज़ल का मशहूर शेर तो आपको याद ही होगा ।
लौटने में कम पड़ेगी उम्र की पूंजी हमें, आप तक आने में ही हमको ज़माने लग गये
मुनव्वर भाई ने जिन बहरों पर जियादह काम किया है उनमें ये बहर भी है ।
एक क़ैदी की तरह मेरी अना बेबस रही, ख्वाहिशें घेरे रहीं मकड़ी के जाले तरह
तो ये है बहरे रमल की एक मुजाहिफ बहर जिसमें चार रुक्न हैं । चार में से तीन रुक्न तो स्थायी रुक्न हैं । बहरे रमल यानि कि जिसका स्थाई रुक्न है फाएलातनु या 2122 । अब इस बहर में भी प्रारंभ्ा के तीन रुक्न तो बिना किसी मिलावट के हैं अर्थात कहीं कोई परिवर्तन नहीं हैं सालिम रुक्न हैं । किन्तु अंतिम रुक्न में से एक पूरा दीर्घ कम हो गया है और वो 2122 के स्थान पर केवल 212 ही रह गया है । चूंकि हम जानते हैं कि जब भी किसी बहर के किसी रुक्न में कहीं कोई परिवर्तन होता है ( मात्राओं का कम या जियादह हो जाना) तो उस रुक्न का एक खास नाम हो जाता है । अब यहां पर इस बहर में 212 या फाएलुन रुक्न का नाम है महजूफ़ । जाहिर सी बात है कि इस मुजाहिफ बहर के नाम में अब ये शब्द भी आयेगा । तो ये हुई बहरे रमल मुसमन महजूफ़ । तोड़ कर कहें तो ये कि चूंकि स्थायी रुक्न है फाएलातुन सो ये है बहरे रमल , चार रुक्न हैं इस कारण ये है मुसमन और फाएलुन भाइजान इसमें हैं सो ये मुजाहिफ बहर हो गई है जिसके नाम में महजूफ़ भी शामिल होगा । आइये इस बहर पर मदन मोहन जी की कम्पोज़ की हुई, लता जी की गई हुई और नक्शलायलपुरी साहब की लिखी हुई ये शानदार ग़ज़ल सुनें । जो फिल्म दिल की राहें से है । अगले अंक में इस बहर पर सुनाने के लिये गीत या ग़ज़ल आप को सुझाना है । कई बार फ्लेश प्लेयर नहीं मिलने के कारण ये गाने का लिंक नहीं दिखता है ।
गीत यदि सुनाई नहीं दे रहा है तो सीधे इस लिंक पर जाकर सुन लें । http://www.archive.org/details/AapKiBatenKaren
या यहां से डाउनलोड करें ।
http://www.divshare.com/download/7880870-47c
आज हम तरही मुशायरे में दो शायरों को ले रहे हैं । मुशायरे का आगाज़ बहुत ही धमाकेदार हुआ है । आदरणीय सुधा ढींगरा जी की कविता ने समां बांध दिया है । कविता सचमुच ही ऐसी थी जिसे रात के सन्नाटे में सुन लो तो आंख से आंसू कब बहने लगेंगें पता ही नहीं चलेगा । सुधा जी का बड़प्पन है कि वे हमारे इस छोटे से आयोजन में शामिल हुईं और हमारा मान बढ़ाया । आशा है आगे भी उनका नेह हमें मिलता रहेगा । मेरे लिये भी सौभाग्य है कि सावन के माह में एक बड़ी बहन मिलीं ।
दिगम्बर नासवा : दिगम्बर की विशेषता उनकी वे छोटी छोटी प्रेम कविताएं हैं जो मन को छूती हुई गुजरती हैं । दिगम्बर नासवा दुबई में रहते हैं और उनकी कविताएं पढ़ कर ऐसा लगता है कि वहां रह कर वे अधिकांश समय प्रेम ही करते हैं । बहुत सुंदर प्रेम कविताएं लिखने वाले दिगम्बर तरही मुशायरे में ग़ज़ल का आग़ाज़ कर रहे हैं क्योंकि मुशायरे का धमाकेदार आगाज़ तो सुधा जी कविता से कर चुकी हैं । सुनिये दिगम्बर को । पहले यो फोटो देखें और जाने दिगम्बर की प्रेम कविताओं का राज ।
रोज़ जो नीलाम होता है सरे बाज़ार से
हाँ वही नायाब गुंचा है तेरे गुलज़ार से
होंसला हो दिल में तो कश्ती उतारो लहर में
ये समुन्दर पार होता है नहीं पतवार से
अपनी यादों के उजाले छोड़ कर क्यों आ गए
रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से
जागते में सो रहा या सोये में जागा हूँ मैं
प्रेम का इकरार आया है निगाहे यार से
तू नहीं जाने दिगम्बर प्यार की भाषा अभी
आरजू, अरमान से, अन्जान है तू प्यार से
वाह वाह वाह बहुत अच्छे शेर निकाले हैं जागते में सो रहा या सोये में जागा हूं मैं प्रेम का इकरार आया है निगाहे यार से, खूब कहा है विशेषकर मिसरा उला तो बहुत ही बेहतरीन है । जागते में सो रहा या सोये में जागा हूं मैं । समां बांध दिया बधाई हो ।
प्रकाश सिंह : ये प्रकाश अर्श नहीं हैं बल्कि प्रकाश सिंह है । पहली बार मुशायरे में आ रहे हैं । इनके बारे में जानने की कोशिश की तथा चित्र भी तलाशा किन्तु नहीं मिला । ये पाठशाला में अभी आये हैं तथा आते ही इन्होंने तरही में शामिल होने का शानदार प्रयास किया है । इनके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली सो इनका एक मेल ही लगा रहा हूं जो इन्होंने मुझे भेजा था ।
मैंने ब्लॉग के बारे में दो तीन महीने पहले ही जानना शुरू किया था...कभी कभी कविता लिखने का प्रयास भी किया..छंद के बारे में बहुत कम जानकारी थी...जो भी भाव आते थे कागज पर रख देता था...कभी कभी मात्राओ और वज्न के बारे में जानने का प्रयास किया पर एक गणित का विद्यार्थी हिंदी में कम कुशल ही होता है...फिर गौतम राजरिशी जी के ब्लॉग पर बहुत सुदर छंद में गजले पढ़ी..वहीं आपके बारे में जानकारी मिली...सुबीर संवाद सेवा ब्लॉग पर गया तो दिल बैठ गया ...आपने २००७ में गजल की कक्षाएं शुरू की थी और में बहु पीछे छूट गया था...खेर मैंने हिम्मत नहीं हारी और पिछले एक माह से आपकी पुराणिक पोस्ट्स पढ़ी..बस मोटा मोटा समझ पाया कि रदीफ़ काफिया,मात्राएँ,वज्न,रुक्न,और बहर और मिसरा से शेर और फिर गजल बनती है.. दोनों हाथ सामने रखकर आपके दे दनादन छडिया खाने को को तैयार हूँ...आप कहेंगे तो उड़नतश्तरी को उठा कर मैदान के चार चक्कर लगालूँगा....और अगर आपका नाम डुबो रहा हूँ तो माफ़ कर दीजियेगा...
रात भर आवाज देता है कोई उस पार से
साथ दे अब और भी चाहा नहीं संसार से
आज जाने दे मुझे क्यूँ रोकता तकरार पे
प्रेम के दो बोल काफी क्या मिलेगा खार से
देख के उनको नजर भर प्यार का दरिया बहा
ज्यूँ घटाएं रातभर जल जल हुईं मल्हार से
आज आजादी कहाँ है ये कहाँ की बंदगी
आँख के आगे जफा तो जी रहे लाचार से
जीत के सारा जहाँ वो रो पड़ा था बाखुदा
हाथ खाली थे, सिकंदर जब गया संसार से
जाम थामे हाथ में साकी पिलाती बारहा
राज पाखी तू बता चढ़ता नशा क्यूँ हार से
बहुत बढि़या अंदाज और आगाज है प्रकाश जी, आपको उड़नतश्तरी को उठाकर मैदान के चक्कर लगाने की ज़रूरत बिल्कुल नहीं हैं । जीत के सारा वो रो पड़ा था बाखुदा, हाथ खाली थे सिकंदर जब गया संसार से एक सिकंदर के साथ बहुत अच्छी गिरह बांधी है । आनंद आ गया । मुहावरे और कहावतों को किसी ग़ज़ल के शेर में लेना बहुत मुश्किल काम होता है । मेरे एक मित्र हैं रियाज मोहम्मद रियाज उनका मतला है देश का हम क्या हाल सुनाएं, अंधे पीसें कुत्ते खाएं । उसी प्रकार की गिरह बांधी है आपने सिकंदर के साथ । बहुत अच्छा है । अब हमारे पास दो प्रकाश हैं एक प्रकाश अर्श और दूसरे प्रकाश सिंह ।
चलिये आनंद लीजिये दोनों ग़ज़लों का और मुझे इजाजत दीजिये । अगले अंक में मिलते हैं दो और शायरों से । जो लोग अभी भी ग़ज़लें भेजना चाहें भेज सकते हैं । अभी एडमीशन चालू हैं । और हां बहर पर फिल्मी ये गैर फिलमी गीत ग़ज़ल अवश्य सुझायें ।






