Saturday, 11 July, 2009

रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से, ये पूरा तरही मुशायरा अब समर्पित है अग्रज कवि, मंच पर शालीन और निष्‍छल हास्‍य के हामी श्री ओम व्‍यास ओम को ।

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ओम जी को जाना था सो वो चले गये बावजूद हम सब की दुआओं और शुभकामनाओं के । कवि श्री संदीप शर्मा ने जैसा मुझे बताया था उस हिसाब से मन में कहीं न कहीं ये डर हमेशा ही लगा रहा पिछले एक माह में कि ओम जी हंसाते हंसाते रुला न जायें । और हुआ भी वही । बहुत सारी यादें हैं, बहुत सारी स्‍मृतियां हैं । यादें जो अच्‍छी होती हैं तो भी रुलाती हैं और बुरी होती हैं तो भी । कहीं किसी ब्‍लाग पर कमेंट में मैंने लिखा कि हम अब हंसने के अधिकारी ही नहीं रहें हैं । हम अपने जीवन में इतना कुछ गलत कर रहे हैं क‍ि अब हंसने जैसी निष्‍छल चीज पर हमारा कोई अधिकार ही नहीं रहा है । और इसीलिये जब ओम जी जैसा कोई आकर हमें हंसाता है तो उस ऊपर वाले को ऐसा लगता है कि ये तो उसके अधिकार क्षेत्र में दखल कर रहा है और बस । ओम जी ने मंचों पर कभी भी फूहड़ता और द्विअर्थी संवादों को सहारा नहीं लिया । उनकी कलावती लीलावती की कहानी में इतना सौम्‍य हास्‍य है कि उसके आगे लाफ्टर जैसे हजारों कार्यक्रम भी बौने दिखाई देते हैं । उनके जाने के बाद कई बार उनकी कलावती लीलावती का वीडियो देखता रहा । उनकी कलावती लीलावती को आज मंच के कई सारे कवि अपने नाम से पढ़ रहें हैं लेकिन दादा का अपना अलग ही अंदाज था कलावती लीलावती पढ़ने का । सीहोर के मंच पर एक बार एक कवि ने एक अत्‍यंत अशालीन चुटकुला पढ़ दिया जिस पर उसको काफी तालियां भी मिलीं  । मंच पर दादा माणिक वर्मा, सांड नरसिंहपुरी, पवन जैन, अशोक भाटी जैसे कवि बैठे थे । ओम जी ने मुझे पास बुलाया और कहा बिठा दूं इसको । मैंने कहा दादा आप संचालक है जो उचित लगे सो करो । ओम जी ने माइक पर ऐसी झाड़ लगाई उस कवि को और कहा ये श्रोता वही खाते हैं जो हम परोसते हैं, आपके पास कविता हो तो पढ़ो नहीं तो बैठ जाओ । और वो कवि बैठ गये । जनता ने तालियां बजा कर ओम जी के निर्णय पर मुहर लगा दी । ऐसे थे ओम जी । मेरी श्रद्धांजलि और इस बार का पूरा तरही मुशायरा ओम जी की स्‍मृतियों को समर्पित ।

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स्‍मृति शेष :- सीहोर का वो कवि सम्‍मेलन जिसका संचालन दादा ओम व्‍यास ने किया था

तरही मुशायरा इस बार का तरही मुशायरा कुछ लम्‍बा चलना है और ये भी कि इस बार काफी अच्‍छी ग़ज़लें मिली हैं और इन ग़ज़लों में बहुत कुछ ऐसा है जो मन को छू लेने वाला है ।

बहर :   इस बार हमने जो बहर ली थी वो बहुत ही आसान सी बहर थी । आसान लेकिन बहुत ही लोकप्रिय बहर है ये । कई अच्‍छी ग़ज़लें इस बहर पर लिखी गई हैं । मुनव्‍वर राना साहब की मशहूर ग़ज़ल का मशहूर शेर तो आपको याद ही होगा ।

लौटने में कम पड़ेगी उम्र की पूंजी हमें, आप तक आने में ही हमको ज़माने लग गये

मुनव्‍वर भाई ने जिन बहरों पर जियादह काम किया है उनमें ये बहर भी है ।

एक क़ैदी की तरह मेरी अना बेबस रही, ख्‍वाहिशें घेरे रहीं मकड़ी के जाले तरह

तो ये है बहरे रमल की एक मुजाहिफ बहर जिसमें चार रुक्‍न हैं । चार में से तीन रुक्‍न तो स्‍थायी रुक्‍न हैं । बहरे रमल यानि कि जिसका स्‍थाई रुक्‍न है फाएलातनु या 2122 । अब इस बहर में भी प्रारंभ्‍ा के तीन रुक्‍न तो बिना किसी मिलावट के हैं अर्थात कहीं कोई परिवर्तन नहीं हैं सालिम रुक्‍न हैं । किन्‍तु अंतिम रुक्‍न में से एक पूरा दीर्घ कम हो गया है और वो 2122 के स्‍थान पर केवल 212 ही रह गया है । चूंकि हम  जानते हैं कि जब भी किसी बहर के किसी रुक्‍न में कहीं कोई परिवर्तन होता है ( मात्राओं का कम या जियादह हो जाना) तो उस रुक्‍न का एक खास नाम हो जाता है । अब यहां पर इस बहर में 212 या  फाएलुन  रुक्‍न का नाम है महजूफ़ । जाहिर सी बात है कि इस मुजाहिफ बहर के नाम में अब ये शब्‍द भी आयेगा । तो ये हुई बहरे रमल मुसमन महजूफ़ । तोड़ कर कहें तो ये कि चूंकि स्‍थायी रुक्‍न है फाएलातुन  सो ये है बहरे रमल , चार रुक्‍न हैं इस कारण ये है मुसमन  और फाएलुन  भाइजान इसमें हैं सो ये मुजाहिफ बहर हो गई है जिसके नाम में  महजूफ़  भी शामिल होगा । आइये इस बहर पर मदन मोहन जी की कम्‍पोज़ की हुई, लता जी की गई हुई और नक्‍शलायलपुरी साहब की लिखी हुई ये शानदार ग़ज़ल सुनें । जो फिल्‍म दिल की राहें से है । अगले अंक में इस बहर पर सुनाने के लिये गीत या ग़ज़ल आप को सुझाना है । कई बार फ्लेश प्‍लेयर नहीं मिलने के कारण ये गाने का लिंक नहीं दिखता है ।

 

गीत यदि सुनाई नहीं दे रहा है तो सीधे इस लिंक पर जाकर सुन लें । http://www.archive.org/details/AapKiBatenKaren 

या  यहां से डाउनलोड करें ।

http://www.divshare.com/download/7880870-47c

आज हम तरही मुशायरे में दो शायरों को ले रहे हैं । मुशायरे का आगाज़ बहुत ही धमाकेदार हुआ है । आदरणीय सुधा ढींगरा जी की कविता ने समां बांध दिया है । कविता सचमुच ही ऐसी थी जिसे रात के सन्‍नाटे में सुन लो तो आंख से आंसू कब बहने लगेंगें पता ही नहीं चलेगा । सुधा जी का बड़प्‍पन है कि वे हमारे इस छोटे से आयोजन में शामिल हुईं और हमारा मान बढ़ाया । आशा है आगे भी उनका नेह हमें मिलता रहेगा । मेरे लिये भी सौभाग्‍य है कि सावन के माह में एक बड़ी बहन मिलीं ।

दिगम्‍बर नासवा : दिगम्‍बर की विशेषता उनकी वे छोटी छोटी प्रेम कविताएं हैं जो मन को छूती हुई गुजरती हैं । दिगम्‍बर नासवा दुबई में रहते हैं और उनकी कविताएं पढ़ कर ऐसा लगता है कि वहां रह कर वे अधिकांश समय प्रेम ही करते हैं । बहुत सुंदर प्रेम कविताएं लिखने वाले दिगम्‍बर तरही मुशायरे में ग़ज़ल का आग़ाज़ कर रहे हैं क्‍योंकि मुशायरे का धमाकेदार आगाज़ तो सुधा जी कविता से कर चुकी हैं । सुनिये दिगम्‍बर को । पहले यो फोटो देखें और जाने दिगम्‍बर की प्रेम कविताओं का राज ।

DN-Anita

रोज़ जो नीलाम होता है सरे बाज़ार से

हाँ वही नायाब गुंचा है तेरे गुलज़ार से

होंसला हो दिल में तो कश्ती उतारो लहर में

ये समुन्दर पार होता है नहीं पतवार से

अपनी यादों के उजाले छोड़ कर क्यों आ गए

रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से

जागते में सो रहा या सोये में जागा हूँ मैं

प्रेम का इकरार आया है निगाहे यार से

तू नहीं जाने दिगम्‍बर प्‍यार की भाषा अभी

आरजू, अरमान से,  अन्‍जान है तू प्यार से

वाह वाह वाह बहुत अच्‍छे शेर निकाले हैं जागते में सो रहा या सोये में जागा हूं मैं प्रेम का इकरार आया है निगाहे यार से, खूब कहा है विशेषकर मिसरा उला तो बहुत ही बेहतरीन है । जागते में सो रहा या सोये में जागा हूं मैं । समां बांध दिया बधाई हो ।

प्रकाश सिंह :  ये प्रकाश अर्श नहीं हैं बल्कि प्रकाश सिंह है । पहली बार मुशायरे में आ रहे हैं । इनके बारे में जानने की कोशिश की तथा  चित्र भी तलाशा किन्‍तु नहीं मिला । ये पाठशाला में अभी आये हैं तथा आते ही इन्‍होंने तरही में शामिल होने का शानदार प्रयास किया है । इनके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली सो इनका एक मेल ही लगा रहा हूं जो इन्‍होंने मुझे भेजा था ।

मैंने ब्लॉग के बारे में दो तीन महीने पहले ही जानना शुरू किया था...कभी कभी कविता लिखने का प्रयास भी किया..छंद के बारे में बहुत कम जानकारी थी...जो भी भाव आते थे कागज पर रख देता था...कभी कभी मात्राओ और वज्न के बारे में जानने का प्रयास किया पर एक गणित का विद्यार्थी हिंदी में कम कुशल ही होता है...फिर गौतम राजरिशी जी के ब्लॉग पर बहुत सुदर छंद में गजले पढ़ी..वहीं आपके बारे में जानकारी मिली...सुबीर संवाद सेवा ब्लॉग पर गया तो दिल बैठ गया ...आपने २००७ में गजल की कक्षाएं शुरू की थी और में बहु पीछे छूट गया था...खेर मैंने हिम्मत नहीं हारी और पिछले एक माह से आपकी पुराणिक पोस्ट्स पढ़ी..बस मोटा मोटा समझ पाया कि रदीफ़ काफिया,मात्राएँ,वज्न,रुक्न,और बहर और मिसरा से शेर और फिर गजल बनती है.. दोनों हाथ सामने रखकर आपके दे दनादन छडिया खाने को को तैयार हूँ...आप कहेंगे तो उड़नतश्तरी को उठा कर मैदान के चार चक्कर लगालूँगा....और अगर आपका नाम डुबो रहा हूँ तो माफ़ कर दीजियेगा...


रात भर आवाज देता है कोई उस पार से
साथ दे अब और भी चाहा नहीं संसार से

आज जाने दे मुझे क्यूँ रोकता तकरार पे
प्रेम के दो बोल काफी क्या मिलेगा खार से

देख के उनको नजर भर प्यार का दरिया बहा
ज्यूँ घटाएं रातभर जल जल हुईं मल्हार से

आज आजादी कहाँ है ये कहाँ की बंदगी
आँख के आगे जफा तो जी रहे लाचार से

जीत के सारा जहाँ वो रो पड़ा था बाखुदा
हाथ खाली थे, सिकंदर जब गया संसार से

जाम थामे हाथ में साकी पिलाती बारहा
राज पाखी तू बता चढ़ता नशा क्यूँ हार से

बहुत बढि़या अंदाज और आगाज है प्रकाश जी, आपको उड़नतश्‍तरी को उठाकर मैदान के चक्‍कर लगाने की ज़रूरत बिल्‍कुल नहीं हैं । जीत के सारा वो रो पड़ा था बाखुदा, हाथ खाली थे सिकंदर जब गया संसार से  एक सिकंदर के साथ बहुत अच्‍छी गिरह बांधी है । आनंद आ गया । मुहावरे और कहावतों को किसी ग़ज़ल के शेर में लेना बहुत मुश्‍किल काम होता है । मेरे एक मित्र हैं रियाज मोहम्‍मद रियाज उनका मतला है  देश का हम क्‍या हाल सुनाएं, अंधे पीसें कुत्‍ते खाएं ।  उसी प्रकार की गिरह बांधी है आपने सिकंदर के साथ । बहुत अच्‍छा है । अब हमारे पास दो प्रकाश हैं एक प्रकाश अर्श और दूसरे प्रकाश सिंह ।

चलिये आनंद लीजिये दोनों ग़ज़लों का और मुझे इजाजत दीजिये । अगले अंक में मिलते हैं दो और शायरों से । जो लोग अभी भी ग़ज़लें भेजना चाहें भेज सकते हैं । अभी एडमीशन चालू हैं । और हां बहर पर फिल्‍मी ये गैर फिलमी गीत ग़ज़ल अवश्‍य सुझायें ।

Tuesday, 7 July, 2009

सभी गुरुओं और विद्वजनों को प्रणाम करते हुए आज गुरू पूर्णिमा के अवसर पर हम प्रारंभ करते हैं तरही मुशायरा -रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से ।

( नोट अब ये ब्‍लाग इंटरनेट एक्‍सप्‍लोरर में बिल्‍कुल नहीं खुल रहा है यदि आपके साथ भी ऐसा हो तो इसे मोजिला फायर फाक्‍स या गूगल क्रोम में खोलें । )

सभी गुरुओं को मेरी और से विनयां‍जलि पोस्‍ट पढ़ने से पहले इसे ज़रूर सुनें

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पर्वतों से भी ऊंचे होते हैं गुरू जिनकी तलहटी में हम सुमन बनकर खिलते हैं और उनके ज्ञान की सुवास को फैलाते हैं ।

गुरू पूर्णिमा का स्‍थान आजकल शिक्षक दिवस ने ले लिया है । मेरे विचार में वो सही भी हुआ क्‍योंकि आजकल गुरू रहे ही कहां हैं, आजकल तो शिक्षक ही हैं । जो ज्ञान दे वो गुरू होता है और जो शिक्षा दे वो शिक्षक होता है । पहले ये दोनों काम एक ही व्‍यक्ति करता था, शिक्षा भी वहीं देता था और ज्ञान भी वही देता था । इसीलिये तब एक ही दिन होता था गुरूपूर्णिमा का । किन्‍तु धीरे धीरे हुआ ये कि गुरू कम होते गये और शिक्षक बढ़ते गये ।और इसी कारण ये हुआ कि गुरू पूर्णिमा के अलग एक और दिन आ गया जिसे शिक्षक दिवस कहा गया । शिक्षा जो कि निर्धारित पुस्‍तकों में लिखे हुए कुछ पूर्व ये तय किये हुए पाठ हैं जिनको निर्धारित समय में निर्धारित तरीके से ही पढ़ाना है । ज्ञान, जिसमें कुछ निर्धारित नहीं है, जिसकी कोई सीमा नहीं है, जिसको कहीं किसी किताब ये पुस्‍तक में नहीं लिखा गया । वो असीम है, वो अनंत है, उसकी कोई सीमा नहीं होती । तो क्‍या एक बहुत अच्‍छा प्रवचनकार भी गुरू होगा ? मेरे विचार में नहीं हो सकता । एक प्रवचनकार जो कि रेशम के वस्‍त्र पहन कर, गले में सोने की मोटी मोटी मालाएं पहन कर हमें मोह माया से दूर रहने के प्रवचन दे रहा हो, वो किस प्रकार हमारा गुरू हो सकता है । उसकी तो स्‍वयं की ही कथनी और करनी में फर्क है । धर्म पर आधारित प्रवचनकारों को हमारे देश के प्राचीन इतिहास में कभी भी गुरू या संत का दर्जा नहीं दिया गया, उनका एक अलग नाम था कथा वाचक या प्रवचनकार । इनको हम शिक्षक की श्रेणी में ले सकते हैं । जिस प्रकार एक शिक्षक जो रसायन शास्‍त्र का बहुत अच्‍छा ज्ञाता है वो रसायन शास्‍त्र बहुत अच्‍छे से समझाता है उसी प्रकार ये प्रवचनकार भी किसी न किसी धर्मग्रंथ के बहुत अच्‍छे ज्ञाता हैं और इसी कारण ये उस विषय को बहुत अच्‍छे से समझाते हैं और उसी कारण ये भी शिक्षक हैं । शिक्षक के लिये आवश्‍यक नहीं होता कि वो जो कुछ कहे उस पर स्‍वयं भी अमल करे, किन्‍तु गुरू के लिये होता है । इसी कारण ये प्रवचनकार जो विषय विशेषज्ञ हैं ये भी यदि प्रवचन में ये कह रहे हैं कि मोह माया त्‍यागो, और स्‍वयं गले में सोने की मोटी सांकलें डाले हैं, तो भी ये दोषी नहीं हैं । क्‍योंकि ये तो आपको केवल वो बता रहे हैं जो कि किसी ग्रंथ में लिखा है । जिस प्रकार रसायन शास्‍त्र का शिक्षक पोटेशियम साइनाइड के जहरीलेपन का बताते समय उसे चाट कर नहीं बतायेगा, उसी प्रकार ये प्रवचनकार भी हैं । इसके विपरीत गुरू वो होता है जो कुछ कहने से पहले स्‍वयं उस पर अमल करता है । उसकी कथनी और करनी एक ही होती है । वो पुस्‍तकों से ज्ञान लेता है और उस ज्ञान पर आधारित अपनी ही एक धारा तैयार करता है । संत की परिभाषा और भी ऊपर है और वहां तक पहुंचना एक बहुत ही दुष्‍कर कार्य है । कुल मिलाकर बात ये कि शिक्षक वो होता है हमें पूर्व से बने हुए रास्‍तों पर चलने की शिक्षा प्रदान करता है, गुरू वो होता है जो हमें नये रास्‍ते स्‍वयं बनाने का ज्ञान देता है और संत वो होता है जो कि न तो पूर्व से बने रास्‍तों पर चलता है न ही नये बनाता है, वो तो चलता जाता है और उसके पद चिह्न ही आगे चलकर रास्‍ते बन जाते हैं ।

मेरे जीवन में कई सारे शिक्षक आये और कुछ गुरू भी आये । पहले गुरू जिनका मैं आज स्‍मरण करना चाहता हूं वो थे स्‍वर्गीय श्री मुरलीधर जी जोशी । ये वास्‍तव में तो शिक्षक थे और मुझे पढ़ाते थे । लेकिन ये वास्‍तव में गुरू थे । वे बहुत ही अलग तरह के थे । ग़रीब होने के बाद भी एक विचित्र प्रकार के स्‍वाभिमान से ठसाठस । गाते बहुत अच्‍छा थे । उनकी आवाज़ में 'आंसू भरी हैं ये जीवन की राहें सुनने का एक अलग ही आनंद था । एक बार मैंने देखा कि उनकी शर्ट पर एक खटमल चल रहा है । मैंने कहा मास्‍साब हाथ सीधा करें मैं उसको मार देता हूं । वे मुस्‍कुराये और एक काग़ज फाड़ा उस पर उस छोटे से जीव को बिठाया और बाहर पेड़ों पर छोड़ दिया । मैंने कहा मास्‍साब ये क्‍यों किया तो बोले दया करने से अच्‍छा आनंद कोई नहीं हैं । उनसे बहुत कुछ सीखा । किन्‍तु असमय ही एक रात वे सोये तो उठे ही नहीं । मेरे अंदर करुणा का बीजारोपण करने वाले वही थे । मेरे पिता जो कि आज भी कर्म करते हैं रिटायरमेंट के लगभग बारह साल बाद भी, उनसे मैंने सीखा कि कर्म ही प्रधान है, उनसे एक बात और सीखी कि पैर उतने ही फैलाओ जितनी चादर हो । वे कभी भी कर्ज पर कोई चीज लेने की वकालत नहीं करते । फिर मेरी मां जिन्‍होंने मुझे स्थिर चित्‍त रहना सिखाया और प्रतिक्रिया देने के बजाय सहज रहने के गुण दिये । फिर काफी लोग मिले । जैसे श्री नारायण कासट जी जिन्‍होंने मुझे कविता के बारे में काफी ज्ञान दिया । श्री रमेश हठीला जी जिन्‍होंने गीत की रचना करना सिखाया और पुस्‍तकों से सीखा गया बहुत सारा ज्ञान जो उन रचनाकारों के कारण सीख पाया । जिनकी वे पुस्‍तकें थीं । रेणु जी, गुलशन नंदा जी, मन्‍‍टो जी, कमलेश्‍वर जी, रविन्‍द्र कालिया जी ये वो कहानीकार हैं जिन्‍होंने मुझे कहानी से परिचय करवाया, मैं एकलव्‍य की तरह इनसे बिना मिले ही इनके साहित्‍य को गुरू बना कर साधना करता रहा । लता मंगेशकर जी की आवाज़ को भी मैं अपना गुरू मानता हूं क्‍योंकि उसी आवाज़ ने मुझे बताया कि जीवन में सुरीला होना कितना ज़रूरी है ।  आज गुरू पूर्णिमा के अवसर पर सभी गुरुओं को मेरी विनयांजलि, मैं जहां भी आज हूं वहां कतई नहीं होता यदि ये सब नहीं होते । मुझे जो कुछ बनाया है वो मेरे गुरुओं ने बनाया है ।

तरही मुशायरा इस बार का काफी रोचक होना है । इस बार जो ग़ज़लें प्राप्‍त हुई हैं उनमें कुछ शेर तो बस ऐसे हैं कि मन को छूते हुए गुजर जाते हैं । इस बार का मिसरा था रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से  । कई लोगों ने मिसरे को खूब सराहा । हकीकत ये है कि बरसों पहले डायरी में अटकाया ये मिसरा जिस पर कभी मिसरे से आगे कुछ नहीं कर पाया उस पर लोगों ने इतनी सुंदर ग़ज़लें लिख दीं कि अपने पर शर्म आती है । कंचन ने आज फोन लगाया तो बड़ी अच्‍छी बात कही गुरूजी आवाज़ तो कोई सबको ही देता है रात भर लेकिन कवि उस आवाज़ को  पहचान लेता है और उसे शब्‍दों में ढाल देता है ।  कंचन ने मानों मिसरे को पूरा खोल कर रख दिया ।

एक दिन मोबाइल पर अचानक एक बहुत ही सुरीली आवाज़ सुनाई दी पहले तो मैं हलो से आगे ही कुछ नहीं कह पाया क्‍योंकि आवाज़ का सुरीलापन ही कुछ नहीं कहने दे रहा था । फिर आवाज़ ने अपना परिचय दिया मैं सुधा ढींगरा बोल रही हूं। हिंदी की जानी मानी कथाकार जिनकी कहानियां हिंदी की लगभग हर पुस्‍तक में मैंने तब पढ़ीं जब मैं लिखना सीख रहा था, एक क्षण को मैं स्‍तब्‍ध सा रहा ही कुछ बोल पाया । सुधा दीदी ने कहा कि  आप ने एक पंक्ति अपने ब्लाग पर डाली थी, मैं ग़ज़ल तो नहीं लिखती पर एक छंदमुक्त कविता पढ़ने के लिए भेज रही हूँ. वह पंक्ति मुझे बहुत पसंद आई और कुछ लिखा गया, पंजाब के चर्चित प्रेमियों पर ।

ये हमारा सौभाग्‍य है कि हिंदी की इतनी दिग्‍गज कथाकार डॉ. सुधा ओम ढींगरा जी की एक बहुत ही सुंदर कविता हमें आर्शिवाद के रूप में प्राप्‍त हुई है । आज गुरू पूर्णिमा के अवसर पर ये सुंदर कविता समर्पित है सभी गुरुजनों को । एक बात जिन दिनों में कहानी लिखना सीखने के दौर में था तब जिन लेखिकाओं की कहानियां मुझे खूब भाती थीं उनमें सुधा जी भी हैं, मालती जोशी जी, ममता कालिया जी, नूर जहीर दीदी और सुधा जी ।

पहले सुधा जी का परिचय डॉ. सुधा ओम ढींगरा,कवयित्री, कहानीकार, उपन्यासकार, पत्रकार, रंगमंच, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन कलाकार, समाज सेवी और हिन्दी के प्रचार-प्रसार की अनथक सिपाही।हिन्दी, उर्दू और पंजाबी की चर्चित पत्रकार हैं। जालन्धर रंगमंच, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन की कलाकार रही हैं। मेरा दावा है (अमेरिका के हिन्दी कवियों का काव्य संग्रह), तलाश पहचान की (काव्य संग्रह), माँ ने कहा था (काव्य कैसेट), परिक्रमा (पंजाबी से हिन्दी में अनुवादित उपन्यास), सफर यादों का (काव्य संग्रह प्रकाशनाधीन), वसूली (कहनी संग्रह प्रकाशनाधीन), और गंगा बहती रही (उपन्यास प्रकाशनाधीन), मेरा दावा है (भाग दो) -कार्य चल रहा है। काव्य सहयोग विश्वा तेरे - काव्य सुमन (सम्पादक गिरीश जौहरी), प्रवासी हस्ताक्षर (सम्पादक डॉ. अंजना संधीर), सात समन्दर पार से (सम्पादक डॉ. अंजना संधीर), पश्चिम की पुरवाई (सम्पादक डॉ. प्रेम जनमेजय, सत्यनारायण मौर्य ’बाबा’) पत्रकारिता : संवाददाता -प्रवासी टाइम्स (यू.के.) स्तंभ लेखिका - शेरे-ए-पंजाब (पंजाबी) विदेशी प्रतिनिधी - पंजाब केसरी, जगवाणी, हिन्द समाचार सम्मान : 21 सितम्बर, 1996 अमेरिका में हिन्दी के प्रचार-प्रसार एवं सामाजिक काय… के लिए वाशिंगटन डी.सी. में एम्बैसेडर नरेश चन्द्र से सम्मानित। हिन्दी साहित्य की सेवाओं के लिए नार्थ कैरोलाईना में नागरिक अभिनंदन। ’हैरिटेज सोसाइटी (नार्थ कैरोलाइना)’ द्वारा "प्रतिष्ठित कवियत्री, वर्ष 2005" से सम्मानित। सम्पर्क : ceddlt@yahoo.com

Sudha_Om_Dhingra

रात भर आवाज़ देता है
कोई उस पार से......

सुन सोहणी उसे
उठा माटी का घड़ा
तैर जाती है
चनाव के पानियों में
मिलने अपने महिवाल को
खड़ा है जो नदी के उस पार.....

सस्सी भटकती है थलों में
सूनी काली रातों में
छोड़ गया था पुन्नू सोती सस्सी को
पुन्नू पुन्नू है पुकारती
शायद सुन ले वह उसकी पुकार
खड़ा है जो मरू के उस पार......

फ़रहाद तोड़ता है पहाड़
नदी दूध की निकालने
शर्त प्यार की पूरी करने
तड़प रहा है मिलने शीरी से
पहुँच न पाया उस तक
खड़ी है जो पहाड़ों के उस पार......

साहिबा ने छोड़ा घर- बार
छोड़े भाई और परिवार
भाग निकली मिर्ज़ा संग
गीत में हेक जब लगाई उसने
खड़ा है जो झाड़ियों के उस पार......

हीर ने झाँझर की आवाज़ दबा
ओढ़नी से मुँह छुपा
चुपके से मिलने निकल पड़ी
मधुर स्वर राँझे का उभरा जब
खड़ा है दूर जो घरों के उस पार.........

तरही मुशायरे का इससे अच्‍छा आगाज़ कुछ नहीं हो सकता था । सुधा जी हिंदी की जिस प्रकार सेवा कर रहीं हैं वो अद्भुत हैं । उनके कार्यों को देखकर लगता है कि हां हिंदी की लड़ाई हम हारेंगें नहीं आखिर जीत हमारी ही होगी । आनंद लीजिये इस बहुत ही सुंदर कविता का । सभी गुरुजनों को पुन: पुन: प्रणाम ।

Saturday, 4 July, 2009

गरज कर झूम कर बादल उठे हैं आ भी जाओ तुम ( बरसाती ग़ज़ल) । एक अजूबा हमारे शहर में हुआ बरसात एक बूंद भी नहीं हुई लेकिन नदी में जबरदस्‍त बाढ़ आ गई ।

बरसात, एक ऐसी ऋतु जो हर कवि, लेखक, शायर की सबसे पसंदीदा ऋतु होती है । जब उमड़ घुमड़ के काले मेघ आसमान पर छाते हैं तो ऐसा लगता है मानो आसमान धरती को प्रेम करने के लिये झुका जा रहा है । बहुत पहले एक वर्षा गीत लिखा था अब पूरा तो याद नहीं लेकिन कुछ पंक्तियां इस प्रकार थीं ''मत कहो इसे घन गर्जन है, ये नभ का प्रणय निवेदन है'' ''चपला है या वरमाला है, अंबर ने जिसे उछाला है'' वर्षा मंगल काव्‍य गोष्टियों में इसको बहुत पसंद किया जाता था । अब तो लगभग विस्‍मृत सा हो गया है ये गीत शायद पुरानी किसी डायरी में हो मिला तो पूरा सुनाने की कभी कोशिश करूंगा ।

बरसात के गीत- बरसात को लेकर कई सारे गीत बने हैं । कुछ तो ऐसे हैं कि जो वर्षा का पूरा चित्र सामने ले आते हैं । मेरी कई सारी जो इच्‍छाएं अधूरी हैं उनमें एक ये भी है कि कभी किसी वर्षा से घिरे पहाड़ी जंगल में रात बिताऊं और रात भर वर्षा की ध्‍वनियां सुनूं । वर्षा जो सबसे बड़ी संगीतकार है ।  फिलहाल तो ये गीत सुनाने की इच्‍छा हो रही है जो फिल्‍म परख का है और जिसे लता जी ने ऐसे गाया है कि यूं लगता है मानो सामने बरसात हो ही रही हो । मेरे पसंदीदा वर्षा गीत में  बरसन लागीं सावन बुंदिया-बेगम अख्‍तर, रिमझिम गिरे सावन- लताजी तथा किशोर जी, नाच रे मयूरा नाच रे मयूरा-मन्‍नादा, सावन की रिमझिम में -मन्‍ना दा, बादल तो आये लहरा के छाये-लताजी, अंबुआ तले डोला रख दे मुसाफिर-सुधा मल्‍होत्रा, उमड़ घुमड़ के आई घटा-दो आंखें बारह हाथ, हरियाला सावन ढोल बजाता-दो बीघा जमीन, बादल यूं गरजता है-बेताब, रिमझिम के तराने लेकर आई-काला बाजार, लगी आज सावन की- चांदनी,   और कई कई गीत हैं । कभी अलग से हम इन गीतों की बात करेंगें । फिलहाल तो ये गीत सुनें ।
बरसात का चमत्‍कार-बरसात का ही एक अनोखा चमत्‍कार सीहोर में हुआ । शहर से होकर बहने वाली छोटी सी नदी सीवन पिछले पांच महीनों से बिल्‍कुल ही सूखी पड़ी थी । कल भी दोपहर तक वही हालत थी कि लोग पानी बरसने की उम्‍मीद लगाये बैठे थे । बच्‍चे उसी प्रकार सूखी नदी में खेल रहे थे जैसे खेलते हैं । कि अचानक चमत्‍कार हुआ अचानक देखते ही देखते नदी उफन पड़ी और इस प्रकार की बात की बात में बाढ़ जैसा दृष्‍य हो गया । लोग हैरान थे कि आसमान खाली है कहीं कोई बारिश नहीं है फिर ये बाढ़ कहां से आ गई । पूरा शहर नदी के किनारे एकत्र हो गया । पता चला कि ऊपर कहीं पहाड़ी इलाके में जोरदार बारिश हुई है जो नदी का जल संग्रहण क्षेत्र है । वहीं का पानी ये आ रहा है । इसे कहते हैं प्रकृति का चमत्‍कार इधर सर पर सूरज चमक रहा था । लोग पानी को तरस रहे थै और उधर सूखी नदी में अचानक ही बाढ़ आ गई ।

तरही मुशायरा-तरही मुशायरे को लेकर इस बार काफी उत्‍साह लोगों ने दिखाया है और काफी लोगों की ग़ज़लें मिल चुकी हैं । इस बार की ग़ज़लें सचमुच ऐसी हैं कि सुनने में आनंद आ जायेगा । मेरी इच्‍छा तो ये थी कि सभी की ग़ज़लें उन्‍हीं की आवाज में लगाता किन्‍तु बात वही है कि सबके पास रिकार्डिंग की सुविधा जाने हो या न हो । चलिये ऐसा करेंगें कि इस बार एक वर्षा मंगल काव्‍य गोष्‍ठी करेंगें जिसमें कि सभी की आवाज में ही कविताये होंगीं । फिलहाल तो बात तरही मुशायरे की जिसको लेकर कई सारी रचनाएं तो आ गई हैं और अभी भी आ रही हैं । मेरा विचार है कि 7 जुलाई को तरही मुशायरे का आयोजन प्रारंभ करने का । अपने सभी ज्ञात अज्ञात गुरुओं और उस्‍तादों को गुरू पूर्णिमा के अवसर पर अपनी और से समर्पित करते हुए ये तरही मुशायरे का आयोजन करने की इच्‍छा है । ज्ञात अज्ञात इसलिये क्‍योंकि कई सारे ऐसे हैं जिन्‍होंने मुझे हाथ पकड़ कर सिखाया तो कई ऐसे हैं जिनसे बहुत कुछ सीखा कभी मिला नहीं । उन सबको मेरी और से एक भावांजलि होगा इस बार का तरही मुशायरा । तो 7 जुलाई गुरू पूर्णिमा को हम प्रारंभ करते हैं मिसरे ' रात भर आवाज देता है कोई उस पार से' जिस पर कई अच्‍छी रचनायें हैं । और हां अगला मुशायरा केवल बहर पर होगा जिसमें कोई मिसरा नहीं दिया जायेगा केवल बहर दी जायेगी जिस पर लिखना होगा । और उसमें कम से कम एक शेर बरसात पर, एक सावन पर और एक बहन पर या राखी पर रखना होगा । बहर क्‍या होगी वो जल्‍द ही ।

एक बहुत पुरानी ग़ज़ल-  बरसात से याद आया कि जब लिखना सीख रहा था । उस समय उस्‍ताद लोग कहते थे कि इस पर लिखो उस पर लिखो । कभी दीपावली आ जाती थी तो आदेश होता था कि दीवाली की गोष्ठियां होनी है दीवाली पर लिखो कभी होली तो कभी कुछ और । ऐसे ही कभी किसी वर्षा मंगल में जाना था सो उस्‍ताद का आदेश हुआ कि बरसात पर ग़ज़ल लिख कर लाना । वो दौर था जब ग़ज़ल का ककहरा सीख ही रहे थे । खैर जैसे तैसे लिख कर ले गये । कुछ शेर पसंद भी किये गये । आज बरसों बाद वो ग़ज़ल कहीं से निकली तो यहां प्रस्‍तुत कर रहा हूं । ग़ज़ल जस की तस है जैसी उस समय लिखी थी वैसी ही । कुछ परिवर्तन करके उसका टटकापन समाप्‍त नहीं करना चाहता । जहां जो कमियां हैं वे भी वैसी ही हैं जो लगभग पन्‍द्रह साल पहले की उस गोष्‍ठी के समय थीं । एक और ग़ज़ल भी निकली है जो रक्षाबंधन पर हुई एक बहनों की गोष्‍ठी के लिये लिखी थी । उसे बाद में दैनिक भास्‍कर ने भी छापा । वो कभी बाद में आज तो ये बरसाती ग़ज़ल । आज माड़साब पकड़ में आये हैं एक पुरानी ग़ज़ल देकर सो इसमें खूब छांटिये दोष बहर के कहन के, मात्राओं के, उच्‍चारण के और खबर लीजिये माड़साब की । चूंकि पन्‍द्रह साल पुरानी ग़ज़ल है अत: दोष तो होंगें ही ।

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गरज कर झूम कर बादल उठे हैं ,आ भी जाओ तुम ।
तुम्हारी राह में मौसम बिछे हैं ,आ भी जाओ तुम ॥

कहीं पर बात हम तुम में ,कोई ठहरी हुई सी है ।
शुरू करने हमें कुछ सिलसिले हैं ,आ भी जाओ तुम ॥

जहां पर ख्वाब कोई हमने तुमने ,मिल के रोपा था ।
वहीं उस मोड़ पर ही हम खड़े हैं , आ भी जाओ तुम ॥

जहां तक देखिये नज़रों की हद तक ,सिर्फ बारिश है ।
फुहारों के दुपट्टे से उड़े हैं , आ भी जाओ तुम ॥

बुझा है चांद का कंदील अब तो बस अंधेरा है ।
सितारों के भी सब दीपक बुझे हैं , आ भी जाओ तुम ॥

लगे है यूं के ज्यों पाज़ेब खनकाई  है ये तुमने ।
छमाछम छम छमाछम सुर बजे हैं ,आ भी जाओ तुम॥

अंधेरी रात है ,बरसात है ,और उफ़ ये तनहाई ।
सबर के जाम अब मुंह तक भरे हैं ,आ भी जाओ तुम ॥

कहीं झींगुर की चिकमिक है ,कहीं बारिश की छम छम है ।
सभी सुर आज आपस में  मिले हैं  ,आ भी जाओ तुम ॥

अंधेरा है भले बाहर ,मगर घर में उजाला है ।
तुम्हारी याद के दीपक जले हैं ,आ भी जाओ तुम॥

भिगो कर हाथ बारिश में, मुझे छूती हैं आ आकर ।
हवाऐं  आज पागल सी फिरे हैं , आ भी जाओ तुम ॥

अभी कल तक तो बंजर था ,मगर अब आके देखो तो।
यहां पर हसरतों के गुल खिले हैं ,आ भी जाओ तुम ॥

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